पीड़ा
मेरा दिमाग इतना मैकियावेलियन कैसे हो सकता है?
सुबह का सूरज अचानक ऑरवेलियन कैसे दिखाई दे सकता है?
मेरे विचार कैसे जानबूझकर धमकाने वाले हो सकते हैं?
मेरा मानस इतनी स्वेच्छा से विरोध कैसे कर सकता है?
मेरा मन इस दुष्ट आन्दोलन में कैसे लगा रह सकता है
अपने अवसरवादी छापे में जमकर धोखेबाज।
हो सकता है कि भूकंप तीव्रता से गुजरा हो
फिर भी ये आफ्टरशॉक्स अनंत काल तक कैसे बने रह सकते हैं?
एक परपीड़क लालच जो इस कुरूप प्यास को खिलाता है
उत्साहपूर्वक धर्मयुद्ध करना और मुझे मेरी सबसे खराब स्थिति में देखना।
लेकिन मेरे चेहरे पर एक मुस्कान हजारों शिलाखंडों का भार क्यों उठाए
सिसिफस के कंधों में खिंचाव की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे हैं?
दिल की हर धड़कन आत्मा को एक मंगल के माध्यम से पारित करना है
और भावना एक वाक्य है, मूर्त नहीं
झुनझुनी बह रही है लेकिन एक युग धीरे-धीरे जा रहा है।
एक परिक्रामी दरवाजे की अराजकता में फेंक दिया
अचूक मौन, जीवन के आकर्षण से बंजर।
एक बर्तन कट गया और देखा नहीं गया
इस नारकीय बुखार के सपने से परेशान।

![क्या एक लिंक्ड सूची है, वैसे भी? [भाग 1]](https://post.nghiatu.com/assets/images/m/max/724/1*Xokk6XOjWyIGCBujkJsCzQ.jpeg)



































